Thursday, September 5, 2013

नव परिवर्तनों के दौर में हिंदी ब्लॉगिंग"

नव परिवर्तनों का दौर तकनीकी विकास का दौर है इन परिवर्तनों में तकनीकी विकास इतनी तेज़ी से हो रहा है कि जब तक किसी एक उपभोक्ता वस्तु की जानकारी आम होती है तब तक दूसरी उससे अधिक उन्नत रूप में तैयार हो जाती है| युग पुरुष अमिताभ बच्चन जी ने एक बार ................आती है तब तक नया स्मार्ट फ़ोन नए फीचर्स के साथ बाज़ार में आ जाता है|
ऐसे में यदि हिंदी ब्लॉगिंग की बात की जाये तो ऐसा लगता है जैसे पत्थरों से भरे तालाब में कंकड़ फैंक कर लहरों के उठने का मज़ा लेने की उम्मीद की जाये| परन्तु, ........................... मोहताज़ नहीं| अगर कलम में दम है तो वह सुप्त-प्रायः समाज या देश के भावो में प्रचंड वेग उत्पन्न कर सकती है|

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Wednesday, September 4, 2013

झूठ बोलने की ज़रुरत ही महसूस नहीं होनी चाहिए| अगर कभी गलती हुई है या की है तो स्वीकार कर लेना ही जिंदगी को खूबसूरत बनाने का सर्वोत्तम मन्त्र है|

झूठ बोलना मन की अशांति का प्रमुख कारण होता है|

उषा तनेजा ‘उत्सव’

Monday, September 2, 2013

सामाजिक सोच -कितनी ज़िम्मेदार?


सामाजिक सोच  -कितनी ज़िम्मेदार? 
धार्मिक व अध्यात्मिक गुरु आसा राम आज सलाखों के पीछे हैं| दस पंद्रह दिनों से चल रहा तमाशा आज अपने आधे मुकाम तक पहुँच गया है| 
यह घटना चिंतनशील लोगों के सामने अपने साथ अनगिनत सवाल ले कर खड़ी है| इस घटना से पहले भी कई प्रसिद्द बाबाओं पर यौनाचार प्रताड़ना के आरोप लगते रहे हैं| उनके कुछ अनुयायी तो यह सहन ही नहीं कर पाते कि जिन्हें वो भगवान मानते हैं, उन पर कोई ऊँगली उठाये| और, यह होना भी चाहिए| पर तभी, जब उन्हें इस बात पर विश्वास ही नहीं पूरा भरोसा भी हो कि उनका गुरु यह घृणित कार्य नहीं कर सकता| फिर कड़ी दर कड़ी जब यह साबित हो जाता है कि गुरु ही ज़िम्मेदार है तो उनका मन तो इस बात को स्वीकार कर लेता है लेकिन अपने समाज में वह उसी बात पर अड़ जाता है कि गुरु में उसकी श्रद्धा अटूट है| न केवल वह खुद अड़ जाता है बल्कि अपने धर्म भाईयों को भी जोड़े रखने में एड़ी चोटी का जोर लगा देता है| 

सबसे पहले इस बात पर चर्चा कर ली जाये कि देश या समाज में इन गुरुओं का महत्तव क्या है? 

अगर समग्र व समदृष्टि से देखा व परखा जाये तो एक बात निर्विवाद रूप से सामने आती है कि देश व समाज में असीमित अशांति फैली रहती है| उस अशांति में से एक बड़ा भाग इन धर्म गुरुओं ने नियंत्रित कर रखा है| वह अशांति इन गुरुओं की शरण में जाकर शांत हो जाती है| इसके अलावा वे समाज के उत्थान के लिए भी काफी कार्य करते रहते हैं जिससे कई ज़रूरतमंद व्यक्तियों को फायदा होता है| इसीलिए वे उसे भगवान का दर्जा दे देते हैं|

यहाँ सवाल सिर्फ ज़रूरतमंदों का ही नहीं अपितु उच्च शिक्षा प्राप्त व आर्थिक रूप से सुदृढ़ परिवार भी अपनी मानसिक शांति के लिए इन की शरण में जाते रहते हैं, क्योंकि शांति उच्च शिक्षा या धन से तो नहीं खरीदी जा सकती| वे यह सत्य जान ही नहीं पाते कि सच्ची शांति तो इंसान के भीतर छिपी रहती है| सिर्फ उसे पहचान कर उसे स्वीकार करना ज़रूरी होता है| एक बात और भी है कि जब लोग किसी बाबा की शरण में जाते हैं तो उन्हें दूसरे सभी लोग अपने जैसे ही दिखाई देते हैं इसलिए भी उन्हें वहां जाने से सुकून मिलता है|

 अब एक नज़र दोनों पक्षों पर-

सबसे बड़ा भौतिक सच तो यह है कि आदमी के अन्दर एक जानवर भी रहता है| हर इंसान उस जानवर पर कितना नियंत्रण कर पाता है- यही बात तय करती है कि वह इंसान, इंसान है या इससे ऊपर भगवान या इससे नीचे हैवान| बाकि परिस्थितियां भी उसे इंसान से भगवान या हैवान बनाने में मदद करती हैं| तीसरे, उसके प्रति लोगों की नज़र भी एक कारण बनता है| इस तरह पूर्ण रूप से यह मान लेना कि कोई धार्मिक गुरु कभी कोई अनैतिक कार्य कर ही नहीं सकता, अपने आप को धोखा देने जैसा है| अपनी आत्मा को कुचलने जैसा है|

दूसरी तरफ, जो समाज है, जो किसी बाबा के अनुयायी बनते हैं, वे अपने गुरु पर विश्वास करें, अच्छी बात है, पर अंधविश्वास तो सर्वथा अनुचित है| ऐसे भक्त जो कई कई सालों से गुरु को पूजते आ रहें हैं, अगर वे भी अपने गुरु की बात मानकर अपनी बेटी को अकेले ही बाबा के कमरे में छोड़ देते हैं तो क्या वे कसूरवार नहीं हैं| मान लिया कि वे अपनी बेटी की बीमारी ठीक करवाना चाहते थे, उन्हें इस बात का भरोसा भी था कि बाबा के पास उस बीमारी का इलाज भी है इसलिए वे बाबा के झांसे में आ गए थे, पर, ऐसा कौन सा इलाज है जो अकेले कमरे में होता है? माता-पिता भी साथ नहीं रह सकते? अगर इतना एकांत ज़रूरी है भी तो cctv या पारदर्शी दीवार के पार तो दिखाई दे कि अन्दर क्या हो रहा है!
     
तीसरी बात यह कि कोई मानसिक रूप से अस्वस्थ लड़की, जैसा कि माता-पिता का कहना है (और उसी का इलाज बाबा कर रहे थे), जिसके माता-पिता स्वयं उसी बाबा के परम भक्त थे, किसी भगवान के खिलाफ आरोप क्यों लगा रही है? 

चौथी बात, बाबा उस आरोप से बच क्यों रहे थे| अगर कोई व्यक्ति बेक़सूर हो और उस पर अनैतिकता का संगीन आरोप लगा दिया जाए तो वह एकदम से बिफर जाता है तथा तुरंत सामने आकर अपने आप को बेक़सूर साबित करना चाहता है| फिर इस केस में उल्टा क्यों रहा?

पांचवीं बात, पोलिस, मेडिकल जांच और न्यायपालिका को कितना झूठा समझा जा सकता है?

आदि...     

आखिर इस बुराई के पीछे समाज खुद काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार है| इसमें उस व्यक्ति का कसूर तो बाद में है जिसने भगवा चोला पहन कर पहले लोगों को भक्त बनाया फिर उनकी मजबूरी का फायदा उठाया| समाज के लोगों को ही यह सीखना चाहिए कि वे विश्वास तो करें पर अंधविश्वास नहीं|

...उषा 'उत्सव'

Sunday, September 1, 2013

बेटी की इच्छा लघु कथा

 बेटी की इच्छा 
 लघु  कथा 

"अरे यार शर्मा तूने अपने बेटे को विदेश भेजा है पढने के लिए, तो इतने पैसे का इंतजाम कैसे किया?" श्रीवास्तव ने बेंच पर शर्मा की बगल में बैठते हुए पूछा| 
दोनों सुबह पार्क में जॉगिंग के लिए आते थे| कुछ ही दिनों में दोनों की मित्रता हो गई और एक दूसरे के बारे में जानने लगे थे|
श्रीवास्तव की बेटी जो पढ़ाई में होशियार थी और बारहवीं के बाद विदेश में पढने के लिए उत्सुक थी, हमेशा अपने पापा से इसी बारे में बात करती रहती थी| समय रहते श्रीवास्तव भी खर्च से सम्बंधित जानकारी ले लेना चाहता था|

"शिक्षा के लिए तो बैंकों से क़र्ज़ मिल जाता है| मैंने अपना मकान बैंक के पास रख कर क़र्ज़ ले लिया था| जब बेटे की नौकरी लग जाएगी तो अपनी कमाई से ऋण चुका देगा तथा हमें मकान वापिस मिल जायेगा|" शर्मा ने गर्व से पूरी जानकारी देते हुए कहा| फिर प्रश्न भरी निगाह से श्रीवास्तव की तरफ देखते हुए पूछा,"क्यों?" मन में विचार करते हुए कि इसका बेटा तो है नहीं, सवाल दागा."तुम क्या करोगे यह सब जानकर?"

श्रीवास्तव ने उत्सुक होकर जवाब दिया,"मैं भी मेरी बेटी की इच्छा पूरी करना चाहता हूँ|"

"सठिया गए हो क्या? "शर्मा ने आश्चर्य प्रकट किया| "आज बेटी की पढ़ाई के लिए ऋण, कल उसकी शादी के लिए| फिर वह अपनी ससुराल चली जाएगी| क़र्ज़ कौन चुकाएगा? बेटा होता तो बात और थी..."

श्रीवास्तव का दिमाग सुन्न होता जा रहा था...|   

उषा तनेजा 'उत्सव'