Thursday, September 5, 2013

नव परिवर्तनों के दौर में हिंदी ब्लॉगिंग"

नव परिवर्तनों का दौर तकनीकी विकास का दौर है इन परिवर्तनों में तकनीकी विकास इतनी तेज़ी से हो रहा है कि जब तक किसी एक उपभोक्ता वस्तु की जानकारी आम होती है तब तक दूसरी उससे अधिक उन्नत रूप में तैयार हो जाती है| युग पुरुष अमिताभ बच्चन जी ने एक बार ................आती है तब तक नया स्मार्ट फ़ोन नए फीचर्स के साथ बाज़ार में आ जाता है|
ऐसे में यदि हिंदी ब्लॉगिंग की बात की जाये तो ऐसा लगता है जैसे पत्थरों से भरे तालाब में कंकड़ फैंक कर लहरों के उठने का मज़ा लेने की उम्मीद की जाये| परन्तु, ........................... मोहताज़ नहीं| अगर कलम में दम है तो वह सुप्त-प्रायः समाज या देश के भावो में प्रचंड वेग उत्पन्न कर सकती है|

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Wednesday, September 4, 2013

झूठ बोलने की ज़रुरत ही महसूस नहीं होनी चाहिए| अगर कभी गलती हुई है या की है तो स्वीकार कर लेना ही जिंदगी को खूबसूरत बनाने का सर्वोत्तम मन्त्र है|

झूठ बोलना मन की अशांति का प्रमुख कारण होता है|

उषा तनेजा ‘उत्सव’

Monday, September 2, 2013

सामाजिक सोच -कितनी ज़िम्मेदार?


सामाजिक सोच  -कितनी ज़िम्मेदार? 
धार्मिक व अध्यात्मिक गुरु आसा राम आज सलाखों के पीछे हैं| दस पंद्रह दिनों से चल रहा तमाशा आज अपने आधे मुकाम तक पहुँच गया है| 
यह घटना चिंतनशील लोगों के सामने अपने साथ अनगिनत सवाल ले कर खड़ी है| इस घटना से पहले भी कई प्रसिद्द बाबाओं पर यौनाचार प्रताड़ना के आरोप लगते रहे हैं| उनके कुछ अनुयायी तो यह सहन ही नहीं कर पाते कि जिन्हें वो भगवान मानते हैं, उन पर कोई ऊँगली उठाये| और, यह होना भी चाहिए| पर तभी, जब उन्हें इस बात पर विश्वास ही नहीं पूरा भरोसा भी हो कि उनका गुरु यह घृणित कार्य नहीं कर सकता| फिर कड़ी दर कड़ी जब यह साबित हो जाता है कि गुरु ही ज़िम्मेदार है तो उनका मन तो इस बात को स्वीकार कर लेता है लेकिन अपने समाज में वह उसी बात पर अड़ जाता है कि गुरु में उसकी श्रद्धा अटूट है| न केवल वह खुद अड़ जाता है बल्कि अपने धर्म भाईयों को भी जोड़े रखने में एड़ी चोटी का जोर लगा देता है| 

सबसे पहले इस बात पर चर्चा कर ली जाये कि देश या समाज में इन गुरुओं का महत्तव क्या है? 

अगर समग्र व समदृष्टि से देखा व परखा जाये तो एक बात निर्विवाद रूप से सामने आती है कि देश व समाज में असीमित अशांति फैली रहती है| उस अशांति में से एक बड़ा भाग इन धर्म गुरुओं ने नियंत्रित कर रखा है| वह अशांति इन गुरुओं की शरण में जाकर शांत हो जाती है| इसके अलावा वे समाज के उत्थान के लिए भी काफी कार्य करते रहते हैं जिससे कई ज़रूरतमंद व्यक्तियों को फायदा होता है| इसीलिए वे उसे भगवान का दर्जा दे देते हैं|

यहाँ सवाल सिर्फ ज़रूरतमंदों का ही नहीं अपितु उच्च शिक्षा प्राप्त व आर्थिक रूप से सुदृढ़ परिवार भी अपनी मानसिक शांति के लिए इन की शरण में जाते रहते हैं, क्योंकि शांति उच्च शिक्षा या धन से तो नहीं खरीदी जा सकती| वे यह सत्य जान ही नहीं पाते कि सच्ची शांति तो इंसान के भीतर छिपी रहती है| सिर्फ उसे पहचान कर उसे स्वीकार करना ज़रूरी होता है| एक बात और भी है कि जब लोग किसी बाबा की शरण में जाते हैं तो उन्हें दूसरे सभी लोग अपने जैसे ही दिखाई देते हैं इसलिए भी उन्हें वहां जाने से सुकून मिलता है|

 अब एक नज़र दोनों पक्षों पर-

सबसे बड़ा भौतिक सच तो यह है कि आदमी के अन्दर एक जानवर भी रहता है| हर इंसान उस जानवर पर कितना नियंत्रण कर पाता है- यही बात तय करती है कि वह इंसान, इंसान है या इससे ऊपर भगवान या इससे नीचे हैवान| बाकि परिस्थितियां भी उसे इंसान से भगवान या हैवान बनाने में मदद करती हैं| तीसरे, उसके प्रति लोगों की नज़र भी एक कारण बनता है| इस तरह पूर्ण रूप से यह मान लेना कि कोई धार्मिक गुरु कभी कोई अनैतिक कार्य कर ही नहीं सकता, अपने आप को धोखा देने जैसा है| अपनी आत्मा को कुचलने जैसा है|

दूसरी तरफ, जो समाज है, जो किसी बाबा के अनुयायी बनते हैं, वे अपने गुरु पर विश्वास करें, अच्छी बात है, पर अंधविश्वास तो सर्वथा अनुचित है| ऐसे भक्त जो कई कई सालों से गुरु को पूजते आ रहें हैं, अगर वे भी अपने गुरु की बात मानकर अपनी बेटी को अकेले ही बाबा के कमरे में छोड़ देते हैं तो क्या वे कसूरवार नहीं हैं| मान लिया कि वे अपनी बेटी की बीमारी ठीक करवाना चाहते थे, उन्हें इस बात का भरोसा भी था कि बाबा के पास उस बीमारी का इलाज भी है इसलिए वे बाबा के झांसे में आ गए थे, पर, ऐसा कौन सा इलाज है जो अकेले कमरे में होता है? माता-पिता भी साथ नहीं रह सकते? अगर इतना एकांत ज़रूरी है भी तो cctv या पारदर्शी दीवार के पार तो दिखाई दे कि अन्दर क्या हो रहा है!
     
तीसरी बात यह कि कोई मानसिक रूप से अस्वस्थ लड़की, जैसा कि माता-पिता का कहना है (और उसी का इलाज बाबा कर रहे थे), जिसके माता-पिता स्वयं उसी बाबा के परम भक्त थे, किसी भगवान के खिलाफ आरोप क्यों लगा रही है? 

चौथी बात, बाबा उस आरोप से बच क्यों रहे थे| अगर कोई व्यक्ति बेक़सूर हो और उस पर अनैतिकता का संगीन आरोप लगा दिया जाए तो वह एकदम से बिफर जाता है तथा तुरंत सामने आकर अपने आप को बेक़सूर साबित करना चाहता है| फिर इस केस में उल्टा क्यों रहा?

पांचवीं बात, पोलिस, मेडिकल जांच और न्यायपालिका को कितना झूठा समझा जा सकता है?

आदि...     

आखिर इस बुराई के पीछे समाज खुद काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार है| इसमें उस व्यक्ति का कसूर तो बाद में है जिसने भगवा चोला पहन कर पहले लोगों को भक्त बनाया फिर उनकी मजबूरी का फायदा उठाया| समाज के लोगों को ही यह सीखना चाहिए कि वे विश्वास तो करें पर अंधविश्वास नहीं|

...उषा 'उत्सव'

Sunday, September 1, 2013

बेटी की इच्छा लघु कथा

 बेटी की इच्छा 
 लघु  कथा 

"अरे यार शर्मा तूने अपने बेटे को विदेश भेजा है पढने के लिए, तो इतने पैसे का इंतजाम कैसे किया?" श्रीवास्तव ने बेंच पर शर्मा की बगल में बैठते हुए पूछा| 
दोनों सुबह पार्क में जॉगिंग के लिए आते थे| कुछ ही दिनों में दोनों की मित्रता हो गई और एक दूसरे के बारे में जानने लगे थे|
श्रीवास्तव की बेटी जो पढ़ाई में होशियार थी और बारहवीं के बाद विदेश में पढने के लिए उत्सुक थी, हमेशा अपने पापा से इसी बारे में बात करती रहती थी| समय रहते श्रीवास्तव भी खर्च से सम्बंधित जानकारी ले लेना चाहता था|

"शिक्षा के लिए तो बैंकों से क़र्ज़ मिल जाता है| मैंने अपना मकान बैंक के पास रख कर क़र्ज़ ले लिया था| जब बेटे की नौकरी लग जाएगी तो अपनी कमाई से ऋण चुका देगा तथा हमें मकान वापिस मिल जायेगा|" शर्मा ने गर्व से पूरी जानकारी देते हुए कहा| फिर प्रश्न भरी निगाह से श्रीवास्तव की तरफ देखते हुए पूछा,"क्यों?" मन में विचार करते हुए कि इसका बेटा तो है नहीं, सवाल दागा."तुम क्या करोगे यह सब जानकर?"

श्रीवास्तव ने उत्सुक होकर जवाब दिया,"मैं भी मेरी बेटी की इच्छा पूरी करना चाहता हूँ|"

"सठिया गए हो क्या? "शर्मा ने आश्चर्य प्रकट किया| "आज बेटी की पढ़ाई के लिए ऋण, कल उसकी शादी के लिए| फिर वह अपनी ससुराल चली जाएगी| क़र्ज़ कौन चुकाएगा? बेटा होता तो बात और थी..."

श्रीवास्तव का दिमाग सुन्न होता जा रहा था...|   

उषा तनेजा 'उत्सव'

Saturday, May 4, 2013

अकेले तुम+अकेले हम = आओ साथ चलें !


                      अकेले तुम+अकेले हम = आओ  साथ  चलें !

                                    लेख - उषा तनेजा 

बदलते सामाजिक परिवेश में संयुक्त परिवार एकल परिवार में तब्दील हुआ। अब स्थिति यह हो चुकी है कि एकल परिवार भी विघटन की ओर बढ़ रहा है। युवा हो चुके बच्चे उच्च शिक्षा के लिए दूर जाने लगे हैं। उच्च शिक्षा के सदुपयोग के लिए दूर जाने लगे हैं। पीछे माता-पिता अकेले रह जाते हैं। यहाँ तक तो सब ठीक है। दो हैं तो अकेले कैसे हो सकते हैं? दोनों मिल बैठते हैं। पकाते हैं। खाते हैं। घूमने निकल जाते हैं। समाचार देखते हैं। टी वी देखते हैं। हँसते हैं। बच्चों की याद आने पर रोते हैं। एक दूसरे को दिलासा देते हैं। रूठते हैं। मनाते हैं। लेख आदि पढ़कर चर्चा करते हैं। बहस करते हैं। ... आदि।

पर!

पर तब क्या जब दोनों में से एक दूर चला जाता है? दूर। बहुत दूर! जहाँ से वापिस आना कभी नहीं हो सकता। एक अकेला। जिंदगी के इस मोड़ पर। बच्चे अपनी-अपनी जिंदगियों में मस्त। कभी-कभी मिलना होता है। किसी त्योहार आदि पर। बच्चे अपने बच्चों की बाते करते थकते नहीं। सब खुश। खुशियों के ठहाके लगते हैं।  उस शोरगुल में एक तन्हाई दब जाती है। बूढ़ी हो चुकी तन्हाई। जो अब शोला नहीं रही। जो अब धधकती नहीं। जिसकी तपन अब बच्चों के लिए गर्माहट नहीं रही। राख सी बन गई है। लेकिन जिंदगी अभी बाकी है। बच्चे तो केवल त्योहार मनाने आते हैं। राख बनी तन्हाई पर लोहड़ी जलाते हैं। होली मनाते हैं। दीये जलाते है। घर को रोशन करते हैं। कोना-कोना जगमगाता है। यहाँ तक कि गली के राह्गुजारों के लिए भी रोशनी का इंतजाम किया जाता है। पर, बूढ़ी हो चुकी तन्हाई किसी अँधेरे कोने में रोशनी की एक किरण की बाट जोह रही होती है। ऐसी रोशनी जिसमें वह अपनी बची जिंदगी का अक्स ढूंढ सके। एक ऐसा अक्स जिसके साथ मिलकर वह स्वयं (तन्हाई) को साहचर्य में बदल सके। जिसका हाथ थामकर वह मृतप्राय शेष जीवन में प्राण फूँक सके। 

फिर मन में डर क्यों?

यह समाज? समाज से पहले अपने बच्चे? क्या वे सहमत होंगें? क्या वे हंसेंगें नहीं? मज़ाक नहीं बनायेंगें? क्या वे नए हमसफ़र को अपना पायेंगें? शायद नहीं! उन्हें तो अपनी आज़ादी चाहिए। अपनी खुशियाँ चाहिए। अपना परिवार चाहिए। वो तो अभी जवान हैं। बुड्ढों का क्या? वे तो जीवन काट चुके। वे अब तक की जिंदगी केवल बच्चों के लिए ही जिए तो इसमें बच्चों का दोष तो नहीं। अब भी वे अपने तन्हा बचे अभिभावक की देखभाल करने की पूरी कोशिश तो कर ही रहे हैं। अगर ईश्वर ने उनको अकेला कर दिया है तो इसमें बच्चों का क्या कसूर है? माता अकेली बची भी हैं तो वह मीरा बन कर, श्री कृष्ण को याद करके जिंदगी बिता लेगी। मगर पिता? पिता के लिए तो समस्त वेदों में, पुराणों में, ग्रंथों में कहीं भी कोई ऐसा देवता नहीं है जिसकी तरह वह किसी देवी को अपनी मानकर बाकी जीवन दिखावटी ख़ुशी के साथ व्यतीत कर सके। फिर क्या करें?

समस्या है तो समाधान भी है 

सन 1856 में श्री ईश्वर चंद विद्यासागर के आंदोलनों के दबाव में अंग्रेजी सरकार ने विधवा विवाह को कानूनी मंज़ूरी दे दी थी। लेकिन समाज में कड़ा विरोध हुआ था। इस कानून के बहुत से समर्थकों ने स्वयं आगे आकर स्व-उदाहरण प्रस्तुत किये। धीरे-धीरे समाज ने इस प्रथा को अपना लिया। आज कई समझदार सास-ससुर अपनी विधवा बहु का पुनर्विवाह करवा कर सामाजिक दायित्व बखूबी निभा रहे है। लेकिन बूढ़ी तन्हाई क्या करे? कहाँ जाये। समस्या है तो समाधान भी होता है| 

वाह! फिर और क्या चाहिए?  

चाहिए। फिर भी बहुत कुछ चाहिए। सबसे पहले बच्चों की संवेदनशीलता। ऐसा हृदय जो अकेले रह गए माता या पिता का दर्द महसूस कर सके। ऐसा बर्ताव जो तरस खाया हुआ न हो। ऐसी ख़ुशी जो किसी की तन्हाई को सदा के लिए ख़ुशी में तब्दील करके खुश होती हो। ऐसा संकल्प जो समाज के सामने उदाहरण बन सके। ऐसा प्रेम जो अकेले माता या पिता का सर समाज-सुधार विरोधियों के सामने झुकने न दे। स्वयं का ऐसा निश्चय जो अपने उद्धार के साथ किसी दूसरे की ढलती उम्र में उसका हाथ भी थाम सके। एक ऐसा निर्णय जो बच्चों को स्वयं सुनाया जा सके। एक ऐसी चर्चा जो बच्चों के मन की दुविधा को दूर कर सके। एक ऐसा आत्मविश्वास जो साथी की भावनाओं के साथ तालमेल रख सके। 

ताकि 

अकेले रहो क्यों तुम, अकेले रहें क्यों हम?
आओ आगे बढ़ चलें, मिला कदम से कदम।।

उषा तनेजा 
फतेहाबाद 
हरियाणा 

Wednesday, April 24, 2013

जागने का समय हो गया है

मेरे सपूतों!

कब तक सोते रहोगे? उठो! जागो! जागने का समय हो गया है|  क्या तुम्हें मेरी हालत दिखाई नहीं दे रही? मेरी आत्मा लहू लुहान हो रही है| मेरे ही आँगन में मेरी बच्चियों की सुरक्षा नहीं है| उनके जिस्म को तार तार किया जा रहा है| अपराधियों पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? उनके होंसले बुलंद नज़र आ रहे हैं| शायद इसीलिए बच्चियों के साथ कुकृत्य की घटनाएँ बढती जा रही है| सबसे अधिक अफ़सोस तो इस बात का है कि जिन्हें मैंने उनकी रक्षा और सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सौंप रखी है, वे ही लोग संवेदनहीन हो गए हैं| जब वे अपने कर्तव्य को निभा नहीं पाते तो उसे रफा दफा करने के लिए भ्रष्ट आचारण करते हैं|

दूसरा, जो लोग कानून बनाते हैं, वे ही उन्हें लागू करवाने से पीछे हट जाते है| पर जब कोई निर्बल या असहाय सामने आ जाता है तो उस को बली का बकरा बनाकर वाह वाही लूट ली जाती है| रसूखदारों पर तो उनका जोर चलता नहीं| मेरे सच्चे सपूतों ने संविधान लिखते समय संविधान को विश्वसनीय बनाने के लिए नारा दिया था- जनता के लिए, जनता के द्वारा, जनता का संविधान| पर आज यह केवल शासनकारों के लिए, शासनकारों द्वारा, शासनकारों का ही होकर रह गया है| शासनकार भी ऐसे जो मेरी बच्चियों के साथ हुई दरिंदगी देखकर दुःख तो ज़ाहिर करते हैं, मगर, नियंत्रण ना होने की वजह से मेरे गुस्से का शिकार भी होते हैं| और तो और उन्हें सत्ता का इतना मोह है कि कोई भी अपनी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं|

अकर्मण्यता की हद तो यहाँ तक बढ़ गई है कि सीमा पर पडोसी देश मेरी देह को काटकर अपने साथ मिलाना चाहते हैं पर, मेरे अपने कर्णधार मूक बनकर मेरे अपने सैनिकों को शहादत के लिए मजबूर करते हैं| मेरी इज्ज़त तथा मेरे बहादुर जवानों की जान बचाने के लिए कठोर कदम नहीं उठा रहे| अब मेरी हालत अन्दर व बाहर दोनों तरफ से दयनीय है| क्या कोई समझेगा मेरा मर्म?

मैं अपने ही बच्चों से हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि सत्ता के लिए आपस में ना लड़ें बल्कि मिलकर, एकजुट होकर बाहर वालों से मुझे व अन्दर से मेरी बच्चियों की रक्षा करें| राजनीति देश चलाने की, जनता को सुरक्षित रखने की क़ाबलियत पर करें, न कि कुर्सी हथियाने के लिए| याद रखें कि दुनिया के सामने लीडर वही बन सकता है जो अपने देश के अन्दर उठ रहे चक्रवातों व बाहर के तूफानों को रोक सकें|

अतः सबसे अनुरोध करती हूँ कि उठो, जागो! मेरी रक्षा करो!

स्नेह व शुभकामनाएं!

तुम्हारी भारत माँ

   

Sunday, April 21, 2013

दरिंदगी की हद - इतिहास बढ़ रहा है


दरिंदगी की हद - इतिहास बढ़ रहा है

दिल्ली के गैंग रेप केस में दरिंदगी ने हद ही पार कर दी है। पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहा है। होना भी चाहिए। एक लड़की जिसने जानवरों जैसा वहशीपन झेला है उसके शरीर, दिल, दिमाग व आत्मा तक के चीथड़े कर फैंक दिया गया है। ऐसे में बहस छिड़ी हुई है की आरोपियों को मौत की सजा दी जाये या नहीं। मेरे विचार में तो मौत की सजा इंसान की बुराई को नहीं मारती बल्कि इंसान को मार देती है। ऐसे केस में तो आरोपियों को नपुंसक बना कर, एक हाथ, एक पैर व एक आँख के साथ जीने दिया जाए ताकि उसे देख कर बाकी लोग ऐसे घिनौने कार्य के प्रति सचेत रहें।

यह तो हुई तुरंत प्रतिक्रिया। ज़रा अब विस्तार से इस समस्या पर चर्चा की जाए:

आजकल लड़कों में ऐसी प्रवृतियाँ आम हो रही है। इसका ज़िम्मेदार कौन है?

1) 2-3 साल का बच्चा जब घर से बाहर निकलता है अर्थात जब स्कूल जाना शुरू करता है तो उसके अन्दर सामाजिक संस्कारों के पनपने का समय शुरू हो जाता है। अपने 21-22 साल के अनुभव से मैं यह कह सकती हूँ कि कुछ माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्य अपने बच्चों को उनके बचपन में ऐसी बातें सिखाते हैं, जिसके बोलने या करने पर वे सब बहुत ही खुश होते हैं व खिलखिला कर हँसते है। उस समय बच्चा सही या गलत नहीं जानता वह तो केवल इतना जनता है कि उसकी जिस बात से सभी खुश होते हैं वह अच्छी बात है। इस प्रकार वह बात उसकी आदत बन जाती है, जो बड़े होकर बुराई का रूप ले लेती है।

2) फिर स्कूल में दबाव बनाया जाता है कि वे उसे सुधारें। अगर ऐसी ही कुछ बातों के लिए स्कूल में थोड़ी सी सख्ती की जाती है या अभिभावकों के साथ मिलकर उसकी बुरी आदत को सुधारने पर विचार करने की सलाह दी जाती है तो स्कूल वालों पर ही आरोप मढ़ दिया जाता है। इसीलिए आजकल अधिकतर अध्यापक स्वयं को केवल अपने अध्यापन कार्य तक ही सीमित रखते हैं।

3) बच्चों के अन्दर सहिष्णुता तो बहुत ही कम देखने को मिलती है। स्कूल में अगर किसी एक बच्चे से खेल-खेल में दूसरे को हाथ भी लग जाए तो वह कसकर वापिस मार भी देता है तथा घर जाकर शिकायत भी लगाता है। अगले दिन उसके अभिभावक उसको सहिष्णुता की सीख देने की बजाये उसके सामने ही अध्यापक को बुरा-भला कह जातें हैं।

4) सभी अभिभावकों का यह सपना होता है कि उनका बच्चा बड़ा आदमी बने। खूब पढ़-लिख कर वह बड़ा आदमी बन भी जाये तो मज़बूत चरित्र के बिना सब व्यर्थ है। ऐसे कितने ही उदाहरण हम देख चुके हैं।

5) जब अभिभावकों को इस बात का आभास होता है तब तक देर हो चुकी होती है।

अतः सरकार की तो यह पूरी ज़िम्मेदारी है कि वह दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दे ताकि लड़कियों की ज़िन्दगी सुरक्षित रहे। साथ ही हम जैसे माता-पिता भी अपने कर्त्तव्य को अच्छी तरह निभाएं ताकि फिर कभी किसी मासूम लड़की की ज़िन्दगी बर्बाद न हो।

उषा तनेजा

नव संवत

नव संवत की पहली सुबह अपने आँचल में ढेर सारी सौगातें ले कर आई है. अब हम और हमारी कोशिशों पर निर्भर करता है कि हमारे भाग्य में कौन सी सौगात है. सभी की व्यक्तिगत कामना पूरी हो, इसके साथ ही, आओ हम सब मिलकर एक कामना मानवता की भलाई के लिए करें. 

नया वर्ष सारे विश्व में आतंकवाद को समाप्त करके शांति लाये. यह आतंकवाद कुछ नासमझ लोगों के अधीर मन की उपज है जो दूसरों को को फलता फूलता देखकर धीरज खो बैठते हैं तथा उन्हें नुक्सान पहुंचाकर, उन्हें तडपता हुआ देखकर तृप्त होते हैं. इस तरह दहशत फैलाने में वे स्वयं अपनी अमूल्य जिदगियाँ दांव पर लगा देते है. इस आतंक के मास्टर माइंड लोग मासूम नौजवानों के कोमल मन व दिमाग को इतना भटका देते हैं कि उन्हें सही व गलत का पता ही नहीं लग पता और कुछ रुपयों की खातिर वे कई परिवारों को अनाथ कर जाते हैं.

आज हम सब मिलकर दुआ करें कि ईश्वर विश्व के सभी नौजवानों को सद्बुद्धि प्रदान करें. अगर नव वर्ष की झोली में हमारे लिए कोई ख़ास तोहफा है तो वह निर्दोष मासूम लोगों की भलाई व भटके हुए नौजवानों की सद्बुद्धि में परिवर्तित हो जाए.

-उषा तनेजा