जींस व मोबाइल
http://www.explorerut.com/blog/जींस-व-मोबाइल/
महिलाओं के कपड़े ही क्यों?
हरियाणा में हिंदु महासभा के पदाधिकारियों द्वारा हाल ही में एक फरमान सुनाया गया है कि लड़कियों को मोबाईल फोन रखने व जींस पहनने का अधिकार नहीं होना चाहिए क्योंकि उनको जींस पहने हुए देखकर पुरुष उनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं और बलात्कार जैसी घटनाएँ घटित हो जाती हैं।
निसंदेह ऐसी बयानबाजी कोई नई बयानबाजी नहीं है। इससे पहले भी अनेकों बार अलग अलग सियासी पार्टियों के कई नेताओं द्वारा इसी विषय पर बिना सोचे समझे अपनी घटिया सोच को उजागर किया गया है। क्या किसी भी पार्टी की या किसी भी संस्था की बागडोर हाथ में आ जाने का अर्थ यह होता है कि अपनी स्तरहीन व संकीर्ण व्यक्तिगत सोच के दायरे में ही विकासशील देश और समाज को कैद कर लिया जाए? किसी ऊँचे ओहदे पर बैठा व्यक्ति सामाजिक बुराई पर टिप्पणी करते समय इतना नीचे क्यों गिर जाता है?
मानवीय विकास के इतिहास पर अगर नज़र डालें तो हर बार जब जब भी मानव सभ्यता में विकास के लिए या सामाजिक बुराई को नष्ट करने के लिए क्रांति हुई तब तब ऐसे ही सिरफिरे लोगों ने विरोध किया। लेकिन बदलाव की गति को आज तक कोई भी रोक नहीं पाया। सृष्टि का पहला नियम ही बदलाव है। अगर बदलाव नहीं होगा तो ठहराव में दुर्गंध पैदा होगी और वही दुर्गंध अगर बढ़ती जाए तो मनुष्य का दम घुटने लगेगा और सृष्टि का खत्म होना निश्चित हो जाएगा।
अब अगर मौजूदा हालात की बात करें तो उपर्युक्त बयान को दो अलग अलग भागों में रख कर देखते हैं। पहला, महिलाओं का जींस पहनना। क्या सच में ही महिलाओं का जींस पहनना कारण बनता है बलात्कार की घटनाओं का? मैं जानती हूँ कि बे़तुके बयान देने वालों का जवाब व उनके जैसी ही घटिया सोच वालों का जवाब 'हाँ'ही होगा। ठीक है-मान लिया। हर रोज़ पूरे देश में बलात्कार की खबरें पढ़ने व सुनने को मिलती हैं। मेट्रो सिटीज़ से लेकर छोटे छोटे गावों तक। मेरी एक परिचित 'ज़िला बाल कल्याण समिति' से जुड़ी हैं। उनका यह कहना है कि अधिकतर मामले बच्चियों के साथ बलात्कार से संबंधित होते हैं। इसके अलावा मीडिया से जो खबरें आती हैं उनमें भी आधे मामले छोटी बच्चियों तथा छोटे गांवों के होते है जिनका जींस से दूर का रिश्ता भी नहीं होता। तो कैसे मान लिया जाए कि जींस का पहनावा ही कारण बनता है?
दूसरा, मोबाईल फोन। आज के युग में तकनीकी का बहुत विकास हो रहा है और ऐसे विकास हमेशा समाज की भलाई के लिए ही होते हैं। चाकू की खोज भी समाज की भलाई के लिए हुई थी। इसका अर्थ यह तो नहीं कि यदि उसी चाकू से कोई कत्ल हो जाए तो उसके उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। इसी प्रकार पहिए की खोज ने मानव को कितनी गति प्रदान की है। उसी पहिए की वजह से हर दिन अनगिनत एक्सिडेंट होते हैं। तो क्या पहिए के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया जाए? ऐसे अन्य अनेक उदाहरण हैं।
अब अगर लड़कियों द्वारा मोबाईल फोन रखने पर प्रतिबंध लगा दिया जाए और सलवार कमीज़ के साथ घूँघट पहना दिया जाए तो क्या ऐसी बयानबाजी करने वाले या ऐसी सोच रखने वाले गारंटी दे सकते हैं कि बलात्कार की घटनाएँ नहीं घटेंगीं? जवाब साफ है- नहीं।
इन घटनाओं का दूसरा पहलू भी देखिए। यह न केवल मेरा विचार है बल्कि तर्क संगत तथ्य है कि ऐसी बुराईयाँ कुछ पुरुषों की घटिया व संकीर्ण मानसिकता से उपजती हैं जो अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख सकते। या फिर महिलाओं की आज़ादी को पचा नहीं पाते। लेकिन उन्हें यह याद रखना होगा कि अब महलाओं की आज़ादी को रोकना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। अगर वे महिलाओं की आज़ादी से पीड़ित रहते हैं तो उन्हें अपना नज़रिया बदल लेना चाहिए कि महिलाएँ भी उन सभी चीजों के प्रयोग की हकदार हैं जो हक पुरुषों को प्राप्त हैं।
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महिलाओं के कपड़े ही क्यों?
हरियाणा में हिंदु महासभा के पदाधिकारियों द्वारा हाल ही में एक फरमान सुनाया गया है कि लड़कियों को मोबाईल फोन रखने व जींस पहनने का अधिकार नहीं होना चाहिए क्योंकि उनको जींस पहने हुए देखकर पुरुष उनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं और बलात्कार जैसी घटनाएँ घटित हो जाती हैं।
निसंदेह ऐसी बयानबाजी कोई नई बयानबाजी नहीं है। इससे पहले भी अनेकों बार अलग अलग सियासी पार्टियों के कई नेताओं द्वारा इसी विषय पर बिना सोचे समझे अपनी घटिया सोच को उजागर किया गया है। क्या किसी भी पार्टी की या किसी भी संस्था की बागडोर हाथ में आ जाने का अर्थ यह होता है कि अपनी स्तरहीन व संकीर्ण व्यक्तिगत सोच के दायरे में ही विकासशील देश और समाज को कैद कर लिया जाए? किसी ऊँचे ओहदे पर बैठा व्यक्ति सामाजिक बुराई पर टिप्पणी करते समय इतना नीचे क्यों गिर जाता है?
मानवीय विकास के इतिहास पर अगर नज़र डालें तो हर बार जब जब भी मानव सभ्यता में विकास के लिए या सामाजिक बुराई को नष्ट करने के लिए क्रांति हुई तब तब ऐसे ही सिरफिरे लोगों ने विरोध किया। लेकिन बदलाव की गति को आज तक कोई भी रोक नहीं पाया। सृष्टि का पहला नियम ही बदलाव है। अगर बदलाव नहीं होगा तो ठहराव में दुर्गंध पैदा होगी और वही दुर्गंध अगर बढ़ती जाए तो मनुष्य का दम घुटने लगेगा और सृष्टि का खत्म होना निश्चित हो जाएगा।
अब अगर मौजूदा हालात की बात करें तो उपर्युक्त बयान को दो अलग अलग भागों में रख कर देखते हैं। पहला, महिलाओं का जींस पहनना। क्या सच में ही महिलाओं का जींस पहनना कारण बनता है बलात्कार की घटनाओं का? मैं जानती हूँ कि बे़तुके बयान देने वालों का जवाब व उनके जैसी ही घटिया सोच वालों का जवाब 'हाँ'ही होगा। ठीक है-मान लिया। हर रोज़ पूरे देश में बलात्कार की खबरें पढ़ने व सुनने को मिलती हैं। मेट्रो सिटीज़ से लेकर छोटे छोटे गावों तक। मेरी एक परिचित 'ज़िला बाल कल्याण समिति' से जुड़ी हैं। उनका यह कहना है कि अधिकतर मामले बच्चियों के साथ बलात्कार से संबंधित होते हैं। इसके अलावा मीडिया से जो खबरें आती हैं उनमें भी आधे मामले छोटी बच्चियों तथा छोटे गांवों के होते है जिनका जींस से दूर का रिश्ता भी नहीं होता। तो कैसे मान लिया जाए कि जींस का पहनावा ही कारण बनता है?
दूसरा, मोबाईल फोन। आज के युग में तकनीकी का बहुत विकास हो रहा है और ऐसे विकास हमेशा समाज की भलाई के लिए ही होते हैं। चाकू की खोज भी समाज की भलाई के लिए हुई थी। इसका अर्थ यह तो नहीं कि यदि उसी चाकू से कोई कत्ल हो जाए तो उसके उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। इसी प्रकार पहिए की खोज ने मानव को कितनी गति प्रदान की है। उसी पहिए की वजह से हर दिन अनगिनत एक्सिडेंट होते हैं। तो क्या पहिए के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया जाए? ऐसे अन्य अनेक उदाहरण हैं।
अब अगर लड़कियों द्वारा मोबाईल फोन रखने पर प्रतिबंध लगा दिया जाए और सलवार कमीज़ के साथ घूँघट पहना दिया जाए तो क्या ऐसी बयानबाजी करने वाले या ऐसी सोच रखने वाले गारंटी दे सकते हैं कि बलात्कार की घटनाएँ नहीं घटेंगीं? जवाब साफ है- नहीं।
इन घटनाओं का दूसरा पहलू भी देखिए। यह न केवल मेरा विचार है बल्कि तर्क संगत तथ्य है कि ऐसी बुराईयाँ कुछ पुरुषों की घटिया व संकीर्ण मानसिकता से उपजती हैं जो अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख सकते। या फिर महिलाओं की आज़ादी को पचा नहीं पाते। लेकिन उन्हें यह याद रखना होगा कि अब महलाओं की आज़ादी को रोकना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। अगर वे महिलाओं की आज़ादी से पीड़ित रहते हैं तो उन्हें अपना नज़रिया बदल लेना चाहिए कि महिलाएँ भी उन सभी चीजों के प्रयोग की हकदार हैं जो हक पुरुषों को प्राप्त हैं।