औरत की इतनी दुर्दशा कब तक?
यह शाश्वत सत्य है कि औरत
पुरुष की अर्धांगिनी है| दोनों एक दुसरे के बिना अधूरे हैं| इस सृष्टि के आदि में
जब जीव का विकास हुआ तब से ही नर व मादा दोनों का साथ अत्यंत ज़रूरी रहा है|
ब्रह्मा जी की बनायीं हुई इस सृष्टि में औरत की दुर्गति का इस हद तक पहुँच जाना
संवेदनशील विचारकों के लिए दिल दहला देने वाली स्थिति होती है| फिर भी यदा कदा ऐसी
ही घटनाएँ सामने आती रहती हैं जो पुरुष प्रधान समाज के सामने चीख चीख यह जानने की
कोशिश करती हैं कि आखिर
औरत की ऐसी दुर्दशा क्यों और कब तक?
‘बेटी बचाओ अभियान’ में
अधिकतर देशवासियों का साथ होना कुछ सुकून अवश्य देता है| देश के लगभग हर कोने में
यह अभियान चल रहा है और उनमें से भी ज़्यादातर के सूत्रधार भी पुरुष हैं| फिर भी
लड़कियों व महिलाओं को हीन दृष्टी से देखा जाता है| किसी भी पुरुष के जीवन में बल्कि
इससे भी आगे कि किसी भी इंसान के जीवन में सफलताएं व असफलताएं दोनों ही आती रहती
हैं| अगर दस बार पुरुष सफल हुआ तो कहा जाता है कि यह उसकी अपनी प्रतिभा है और अगर
एक बार विफल हुआ तो पूरे देश के तथाकथित महानुभाव उसकी संगिनी को ही ज़िम्मेदार
ठहरा देने में ज़रा सी भी शर्म महसूस नहीं करते| अनेकों आपत्तिजनक टिप्पणियां व
घटिया आरोप लगाते हुए अपनी ही घटिया मानसिकता का परिचय देते हैं|
जो सच में औरत की कद्र करने
वाले लोग हैं उन्हें भी शर्म महसूस होती है उन पुरुषों का साथी कहलाने में| जो लोग
बेटी बचाने का दंभ भरते हैं क्या वे इस बात का जवाब दे सकते हैं कि क्या बेटी
हमेशा बेटी ही रहेगी? क्या वह व्यस्क होकर किसी की संगिनी या पत्नी नहीं बनेगी?
क्या पत्नी बनने के बाद वह पति की विफलताओं का बोझ अपने सिर पर ढोती रहेगी? तथा और
भी ऐसे कई प्रश्न हैं जो इस पुरुष प्रधान
समाज से जवाब मांग रहे हैं|
हाल ही की घटना आई सी सी
वर्ल्ड कप २०१५ में भारत की हार क्या हुई क्रिकेट खेल के झूठे दीवानों व ओच्छे
प्रंशसकों ने टीम के उप-कप्तान विराट कोहली की प्रेमिका व हिंदी सिनेमा जगत की
जानी मानी अभिनेत्री अनुष्का शर्मा पर भद्दी टिप्पणियों से धावा ही बोल दिया| अगर
किसी लड़की के मनोविज्ञान को समझने वाला इस घटना पर करीब से नज़र रख रहा हो तो उसके
अंतर्मन से यह आवाज़ आती है कि इसमें अनुष्का का क्या कसूर है? वह तो पूरे विश्वास
के साथ ऑस्ट्रेलिया मैच देखने गई थी और ईश्वर से उसने दुआएं भी मांगी होंगीं कि
टीम इंडिया जीत जाए पर खेल तो खेल होता है| यह भी सच है कि उस मैच में न केवल
विराट का खराब प्रदर्शन रहा बल्कि अन्य प्रतिभावान खिलाड़ी भी कोई कमाल नहीं दिखा
सके| तो क्या उनके खराब प्रदर्शन के लिए भी उनकी पत्नियाँ या प्रेमिकाएं ज़िम्मेदार
हैं? अगर हैं तो फिर उनका नाम किसी ने क्यों नहीं लिया?
उपरोक्त सभी बातों का यदि
विश्लेषण किया जाए तो यही बात सामने आती है कि ऊपर पूछे गए सवालों का कोई
तर्क-संगत जवाब हो ही नहीं सकता| यह तो केवल पुरुष प्रधान समाज की वकालत करने वाले
व तुच्छ मानसिकता वाले लोगों की सोच व कार्यशैली है जो पुरुषों की किसी भी तरह की
कमी को छिपाने के लिए औरत पर ही दोष मढ़ देती है और पुरुष को दूध का धुला, ज्ञानवान
व अति निपुण दिखाने के लिए औरत के दिल व आत्मा पर बार बार चोट करने से भी नहीं
चूकती|


