Wednesday, April 24, 2013

जागने का समय हो गया है

मेरे सपूतों!

कब तक सोते रहोगे? उठो! जागो! जागने का समय हो गया है|  क्या तुम्हें मेरी हालत दिखाई नहीं दे रही? मेरी आत्मा लहू लुहान हो रही है| मेरे ही आँगन में मेरी बच्चियों की सुरक्षा नहीं है| उनके जिस्म को तार तार किया जा रहा है| अपराधियों पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? उनके होंसले बुलंद नज़र आ रहे हैं| शायद इसीलिए बच्चियों के साथ कुकृत्य की घटनाएँ बढती जा रही है| सबसे अधिक अफ़सोस तो इस बात का है कि जिन्हें मैंने उनकी रक्षा और सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सौंप रखी है, वे ही लोग संवेदनहीन हो गए हैं| जब वे अपने कर्तव्य को निभा नहीं पाते तो उसे रफा दफा करने के लिए भ्रष्ट आचारण करते हैं|

दूसरा, जो लोग कानून बनाते हैं, वे ही उन्हें लागू करवाने से पीछे हट जाते है| पर जब कोई निर्बल या असहाय सामने आ जाता है तो उस को बली का बकरा बनाकर वाह वाही लूट ली जाती है| रसूखदारों पर तो उनका जोर चलता नहीं| मेरे सच्चे सपूतों ने संविधान लिखते समय संविधान को विश्वसनीय बनाने के लिए नारा दिया था- जनता के लिए, जनता के द्वारा, जनता का संविधान| पर आज यह केवल शासनकारों के लिए, शासनकारों द्वारा, शासनकारों का ही होकर रह गया है| शासनकार भी ऐसे जो मेरी बच्चियों के साथ हुई दरिंदगी देखकर दुःख तो ज़ाहिर करते हैं, मगर, नियंत्रण ना होने की वजह से मेरे गुस्से का शिकार भी होते हैं| और तो और उन्हें सत्ता का इतना मोह है कि कोई भी अपनी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं|

अकर्मण्यता की हद तो यहाँ तक बढ़ गई है कि सीमा पर पडोसी देश मेरी देह को काटकर अपने साथ मिलाना चाहते हैं पर, मेरे अपने कर्णधार मूक बनकर मेरे अपने सैनिकों को शहादत के लिए मजबूर करते हैं| मेरी इज्ज़त तथा मेरे बहादुर जवानों की जान बचाने के लिए कठोर कदम नहीं उठा रहे| अब मेरी हालत अन्दर व बाहर दोनों तरफ से दयनीय है| क्या कोई समझेगा मेरा मर्म?

मैं अपने ही बच्चों से हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि सत्ता के लिए आपस में ना लड़ें बल्कि मिलकर, एकजुट होकर बाहर वालों से मुझे व अन्दर से मेरी बच्चियों की रक्षा करें| राजनीति देश चलाने की, जनता को सुरक्षित रखने की क़ाबलियत पर करें, न कि कुर्सी हथियाने के लिए| याद रखें कि दुनिया के सामने लीडर वही बन सकता है जो अपने देश के अन्दर उठ रहे चक्रवातों व बाहर के तूफानों को रोक सकें|

अतः सबसे अनुरोध करती हूँ कि उठो, जागो! मेरी रक्षा करो!

स्नेह व शुभकामनाएं!

तुम्हारी भारत माँ

   

Sunday, April 21, 2013

दरिंदगी की हद - इतिहास बढ़ रहा है


दरिंदगी की हद - इतिहास बढ़ रहा है

दिल्ली के गैंग रेप केस में दरिंदगी ने हद ही पार कर दी है। पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहा है। होना भी चाहिए। एक लड़की जिसने जानवरों जैसा वहशीपन झेला है उसके शरीर, दिल, दिमाग व आत्मा तक के चीथड़े कर फैंक दिया गया है। ऐसे में बहस छिड़ी हुई है की आरोपियों को मौत की सजा दी जाये या नहीं। मेरे विचार में तो मौत की सजा इंसान की बुराई को नहीं मारती बल्कि इंसान को मार देती है। ऐसे केस में तो आरोपियों को नपुंसक बना कर, एक हाथ, एक पैर व एक आँख के साथ जीने दिया जाए ताकि उसे देख कर बाकी लोग ऐसे घिनौने कार्य के प्रति सचेत रहें।

यह तो हुई तुरंत प्रतिक्रिया। ज़रा अब विस्तार से इस समस्या पर चर्चा की जाए:

आजकल लड़कों में ऐसी प्रवृतियाँ आम हो रही है। इसका ज़िम्मेदार कौन है?

1) 2-3 साल का बच्चा जब घर से बाहर निकलता है अर्थात जब स्कूल जाना शुरू करता है तो उसके अन्दर सामाजिक संस्कारों के पनपने का समय शुरू हो जाता है। अपने 21-22 साल के अनुभव से मैं यह कह सकती हूँ कि कुछ माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्य अपने बच्चों को उनके बचपन में ऐसी बातें सिखाते हैं, जिसके बोलने या करने पर वे सब बहुत ही खुश होते हैं व खिलखिला कर हँसते है। उस समय बच्चा सही या गलत नहीं जानता वह तो केवल इतना जनता है कि उसकी जिस बात से सभी खुश होते हैं वह अच्छी बात है। इस प्रकार वह बात उसकी आदत बन जाती है, जो बड़े होकर बुराई का रूप ले लेती है।

2) फिर स्कूल में दबाव बनाया जाता है कि वे उसे सुधारें। अगर ऐसी ही कुछ बातों के लिए स्कूल में थोड़ी सी सख्ती की जाती है या अभिभावकों के साथ मिलकर उसकी बुरी आदत को सुधारने पर विचार करने की सलाह दी जाती है तो स्कूल वालों पर ही आरोप मढ़ दिया जाता है। इसीलिए आजकल अधिकतर अध्यापक स्वयं को केवल अपने अध्यापन कार्य तक ही सीमित रखते हैं।

3) बच्चों के अन्दर सहिष्णुता तो बहुत ही कम देखने को मिलती है। स्कूल में अगर किसी एक बच्चे से खेल-खेल में दूसरे को हाथ भी लग जाए तो वह कसकर वापिस मार भी देता है तथा घर जाकर शिकायत भी लगाता है। अगले दिन उसके अभिभावक उसको सहिष्णुता की सीख देने की बजाये उसके सामने ही अध्यापक को बुरा-भला कह जातें हैं।

4) सभी अभिभावकों का यह सपना होता है कि उनका बच्चा बड़ा आदमी बने। खूब पढ़-लिख कर वह बड़ा आदमी बन भी जाये तो मज़बूत चरित्र के बिना सब व्यर्थ है। ऐसे कितने ही उदाहरण हम देख चुके हैं।

5) जब अभिभावकों को इस बात का आभास होता है तब तक देर हो चुकी होती है।

अतः सरकार की तो यह पूरी ज़िम्मेदारी है कि वह दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दे ताकि लड़कियों की ज़िन्दगी सुरक्षित रहे। साथ ही हम जैसे माता-पिता भी अपने कर्त्तव्य को अच्छी तरह निभाएं ताकि फिर कभी किसी मासूम लड़की की ज़िन्दगी बर्बाद न हो।

उषा तनेजा

नव संवत

नव संवत की पहली सुबह अपने आँचल में ढेर सारी सौगातें ले कर आई है. अब हम और हमारी कोशिशों पर निर्भर करता है कि हमारे भाग्य में कौन सी सौगात है. सभी की व्यक्तिगत कामना पूरी हो, इसके साथ ही, आओ हम सब मिलकर एक कामना मानवता की भलाई के लिए करें. 

नया वर्ष सारे विश्व में आतंकवाद को समाप्त करके शांति लाये. यह आतंकवाद कुछ नासमझ लोगों के अधीर मन की उपज है जो दूसरों को को फलता फूलता देखकर धीरज खो बैठते हैं तथा उन्हें नुक्सान पहुंचाकर, उन्हें तडपता हुआ देखकर तृप्त होते हैं. इस तरह दहशत फैलाने में वे स्वयं अपनी अमूल्य जिदगियाँ दांव पर लगा देते है. इस आतंक के मास्टर माइंड लोग मासूम नौजवानों के कोमल मन व दिमाग को इतना भटका देते हैं कि उन्हें सही व गलत का पता ही नहीं लग पता और कुछ रुपयों की खातिर वे कई परिवारों को अनाथ कर जाते हैं.

आज हम सब मिलकर दुआ करें कि ईश्वर विश्व के सभी नौजवानों को सद्बुद्धि प्रदान करें. अगर नव वर्ष की झोली में हमारे लिए कोई ख़ास तोहफा है तो वह निर्दोष मासूम लोगों की भलाई व भटके हुए नौजवानों की सद्बुद्धि में परिवर्तित हो जाए.

-उषा तनेजा