Sunday, April 21, 2013

दरिंदगी की हद - इतिहास बढ़ रहा है


दरिंदगी की हद - इतिहास बढ़ रहा है

दिल्ली के गैंग रेप केस में दरिंदगी ने हद ही पार कर दी है। पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहा है। होना भी चाहिए। एक लड़की जिसने जानवरों जैसा वहशीपन झेला है उसके शरीर, दिल, दिमाग व आत्मा तक के चीथड़े कर फैंक दिया गया है। ऐसे में बहस छिड़ी हुई है की आरोपियों को मौत की सजा दी जाये या नहीं। मेरे विचार में तो मौत की सजा इंसान की बुराई को नहीं मारती बल्कि इंसान को मार देती है। ऐसे केस में तो आरोपियों को नपुंसक बना कर, एक हाथ, एक पैर व एक आँख के साथ जीने दिया जाए ताकि उसे देख कर बाकी लोग ऐसे घिनौने कार्य के प्रति सचेत रहें।

यह तो हुई तुरंत प्रतिक्रिया। ज़रा अब विस्तार से इस समस्या पर चर्चा की जाए:

आजकल लड़कों में ऐसी प्रवृतियाँ आम हो रही है। इसका ज़िम्मेदार कौन है?

1) 2-3 साल का बच्चा जब घर से बाहर निकलता है अर्थात जब स्कूल जाना शुरू करता है तो उसके अन्दर सामाजिक संस्कारों के पनपने का समय शुरू हो जाता है। अपने 21-22 साल के अनुभव से मैं यह कह सकती हूँ कि कुछ माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्य अपने बच्चों को उनके बचपन में ऐसी बातें सिखाते हैं, जिसके बोलने या करने पर वे सब बहुत ही खुश होते हैं व खिलखिला कर हँसते है। उस समय बच्चा सही या गलत नहीं जानता वह तो केवल इतना जनता है कि उसकी जिस बात से सभी खुश होते हैं वह अच्छी बात है। इस प्रकार वह बात उसकी आदत बन जाती है, जो बड़े होकर बुराई का रूप ले लेती है।

2) फिर स्कूल में दबाव बनाया जाता है कि वे उसे सुधारें। अगर ऐसी ही कुछ बातों के लिए स्कूल में थोड़ी सी सख्ती की जाती है या अभिभावकों के साथ मिलकर उसकी बुरी आदत को सुधारने पर विचार करने की सलाह दी जाती है तो स्कूल वालों पर ही आरोप मढ़ दिया जाता है। इसीलिए आजकल अधिकतर अध्यापक स्वयं को केवल अपने अध्यापन कार्य तक ही सीमित रखते हैं।

3) बच्चों के अन्दर सहिष्णुता तो बहुत ही कम देखने को मिलती है। स्कूल में अगर किसी एक बच्चे से खेल-खेल में दूसरे को हाथ भी लग जाए तो वह कसकर वापिस मार भी देता है तथा घर जाकर शिकायत भी लगाता है। अगले दिन उसके अभिभावक उसको सहिष्णुता की सीख देने की बजाये उसके सामने ही अध्यापक को बुरा-भला कह जातें हैं।

4) सभी अभिभावकों का यह सपना होता है कि उनका बच्चा बड़ा आदमी बने। खूब पढ़-लिख कर वह बड़ा आदमी बन भी जाये तो मज़बूत चरित्र के बिना सब व्यर्थ है। ऐसे कितने ही उदाहरण हम देख चुके हैं।

5) जब अभिभावकों को इस बात का आभास होता है तब तक देर हो चुकी होती है।

अतः सरकार की तो यह पूरी ज़िम्मेदारी है कि वह दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दे ताकि लड़कियों की ज़िन्दगी सुरक्षित रहे। साथ ही हम जैसे माता-पिता भी अपने कर्त्तव्य को अच्छी तरह निभाएं ताकि फिर कभी किसी मासूम लड़की की ज़िन्दगी बर्बाद न हो।

उषा तनेजा

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