बेटी की इच्छा
लघु कथा
"अरे यार शर्मा तूने अपने बेटे को विदेश भेजा है पढने के लिए, तो इतने पैसे का इंतजाम कैसे किया?" श्रीवास्तव ने बेंच पर शर्मा की बगल में बैठते हुए पूछा|
दोनों सुबह पार्क में जॉगिंग के लिए आते थे| कुछ ही दिनों में दोनों की मित्रता हो गई और एक दूसरे के बारे में जानने लगे थे|
श्रीवास्तव की बेटी जो पढ़ाई में होशियार थी और बारहवीं के बाद विदेश में पढने के लिए उत्सुक थी, हमेशा अपने पापा से इसी बारे में बात करती रहती थी| समय रहते श्रीवास्तव भी खर्च से सम्बंधित जानकारी ले लेना चाहता था|
"शिक्षा के लिए तो बैंकों से क़र्ज़ मिल जाता है| मैंने अपना मकान बैंक के पास रख कर क़र्ज़ ले लिया था| जब बेटे की नौकरी लग जाएगी तो अपनी कमाई से ऋण चुका देगा तथा हमें मकान वापिस मिल जायेगा|" शर्मा ने गर्व से पूरी जानकारी देते हुए कहा| फिर प्रश्न भरी निगाह से श्रीवास्तव की तरफ देखते हुए पूछा,"क्यों?" मन में विचार करते हुए कि इसका बेटा तो है नहीं, सवाल दागा."तुम क्या करोगे यह सब जानकर?"
श्रीवास्तव ने उत्सुक होकर जवाब दिया,"मैं भी मेरी बेटी की इच्छा पूरी करना चाहता हूँ|"
"सठिया गए हो क्या? "शर्मा ने आश्चर्य प्रकट किया| "आज बेटी की पढ़ाई के लिए ऋण, कल उसकी शादी के लिए| फिर वह अपनी ससुराल चली जाएगी| क़र्ज़ कौन चुकाएगा? बेटा होता तो बात और थी..."
श्रीवास्तव का दिमाग सुन्न होता जा रहा था...|
Kya baat hai jawab nahi apka
ReplyDeleteDhanyavaad ji.
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